विश्वभारती में हिंदी पत्रकारिता के बदलते दौर पर हुआ महामंथन

विश्वभारती में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में पत्रकारिता के इतिहास, बदलती भाषा, एआई, कॉरपोरेट प्रभाव और संपादकीय स्वतंत्रता पर विशेषज्ञों ने विचार रखे।

संजय कुमार सिंह

शांतिनिकेतन : विश्वभारती विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘हिंदी पत्रकारिता का सफर : बदलती भाषा, बदलते तेवर’ का सफलतापूर्वक समापन हुआ। दो दिनों तक चले इस आयोजन में देशभर से पहुंचे वरिष्ठ पत्रकारों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास से लेकर वर्तमान दौर में एआई, बाजारीकरण और कॉरपोरेट प्रभाव के बीच मीडिया के सामने खड़ी चुनौतियों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में ‘भाषा’ और ‘समागम’ पत्रिकाओं का लोकार्पण किया गया। मुख्य अतिथि विश्वभारती के कुलसचिव डॉ. विकास कुमार मुखोपाध्याय की उपस्थिति में प्रो. मुक्तेश्वर नाथ तिवारी ने बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने ‘उदंत मार्तंड’ से डिजिटल युग तक हिंदी पत्रकारिता की यात्रा और उसकी जनपक्षधर भूमिका पर प्रकाश डाला। सत्र की अध्यक्षता प्रो. मृणाल कांति मंडल ने की। संचालन डॉ. सुभाष चन्द्र राय ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुकेश लोहार ने प्रस्तुत किया।

पहले दिन के वैचारिक सत्रों में जयदीप चटर्जी, डॉ. बिप्लब लौह चौधरी, डॉ. बृजेन्द्र अग्निहोत्री और डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी ने भारतीय नवजागरण, ‘वंदे मातरम’ के व्यापक अर्थ और निष्पक्ष पत्रकारिता के मूल्यों पर चर्चा की। वक्ताओं ने पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों और उसकी जनोन्मुखी भूमिका को रेखांकित किया।

द्वितीय सत्र में डॉ. गणेश रजक, डॉ. श्रीकांत द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. भारतीय वसंत कुमार और प्रो. हरिश्चंद्र मिश्र ने प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता, तटस्थता और पत्रकारिता के मूल मूल्यों पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने बदलते मीडिया परिदृश्य में भरोसे और निष्पक्षता को महत्वपूर्ण बताया।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने बांधा समां

पहले दिन आयोजित सांस्कृतिक संध्या में संगीत भवन के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से माहौल को जीवंत बनाया। डॉ. मनोज कुमार शर्मा के सितार वादन के साथ विश्वजीत साहू ने तबले पर युगलबंदी की। विभाग के विद्यार्थियों ने भी विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।

दूसरे दिन के प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. रामेश्वर मिश्र ने की। इस दौरान ‘दिनमान’ और ‘विशाल भारत’ जैसी कालजयी पत्रिकाओं के हिंदी पत्रकारिता में योगदान को याद किया गया। डॉ. उत्कर्ष सिन्हा और डॉ. मनोज कुमार शुक्ला ने घटती संपादकीय स्वायत्तता और बढ़ते बाजारीकरण को लेकर चिंता व्यक्त की।

इसी सत्र में डॉ. मयंक भार्गव ने चैटजीपीटी और ‘अनुवादिनी ऐप’ जैसे एआई आधारित साधनों के दौर में समाचारों की सत्यता और विश्वसनीयता से जुड़े सवालों पर विचार रखा। डॉ. रंजना शर्मा ने पत्रकारिता और समाज में बढ़ते ‘हिंग्लिश’ के प्रभाव पर चर्चा की।

द्वितीय सत्र में प्रो. शकुन्तला मिश्र, डॉ. प्रमोद शर्मा, डॉ. राजीव रंजन प्रसाद, डॉ. राहुल सिंह, डॉ. राजू कुमार और डॉ. श्रुति कुमुद ने पत्रकारिता में कॉरपोरेट प्रभाव, प्रेस फ्रीडम रैंकिंग में गिरावट, पूर्वोत्तर क्षेत्र की मीडिया में उपेक्षा और स्थानीय पत्रकारों के उत्पीड़न जैसे मुद्दों को उठाया। वक्ताओं ने बदलते मीडिया वातावरण में पत्रकारों की स्वतंत्रता और स्थानीय मुद्दों को पर्याप्त स्थान दिए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोध पत्र

संगोष्ठी का तृतीय सत्र शोधार्थियों पर केंद्रित रहा। इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार डॉ. भारतीय बसंत कुमार ने की। सत्र में अमित कुमार, अमित सिंह, मम्पी शर्मा, शिवम कुमार, जेम्स हांसदा, निकिता कुमारी, अन्वेषा कबीरत्ना, बुधुराम बेहेरा, मानसी कुमारी, अमन कुमार होली और चिराग शर्मा ने विभिन्न विषयों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

दूसरे दिन की सांस्कृतिक संध्या में विश्वभारती के परीक्षा विभाग में कार्यरत रतन ओझा और संगीत भवन के शिल्प अध्यापक प्रभात जी ने प्रस्तुति दी। अनुभव चौधरी और अशोक ने संगतकार के रूप में सहयोग किया। विभाग के विद्यार्थियों ने भी सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में डॉ. सुभाष चन्द्र राय, मंचासीन अनीता डगोरे और श्री हकीकत के नेतृत्व में आयोजन का आधिकारिक समापन हुआ। विभागाध्यक्ष डॉ. जगदीश भगत ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इसके साथ ही संगोष्ठी का समापन आश्रम संगीत के साथ हुआ।

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