कसमार I कसमार प्रखंड के हिसीम पंचायत अंतर्गत हिसीम गांव में लगातार बारिश के बीच एक बेहद गरीब आदिवासी परिवार के सामने रहने का संकट खड़ा हो गया है। गांव निवासी 65 वर्षीय सुरोधानी देवी, पति स्व. महेश्वर मांझी का कच्चा खपरैल मकान बारिश के दौरान अचानक गिर गया। घर ढहने के बाद महिला के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर छिपाने की है।
मकान गिरने के बाद परिवार खुले आसमान के नीचे आने की स्थिति में पहुंच गया। लगातार बारिश और सुरक्षित रहने की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण सुरोधानी देवी को फिलहाल घर के समीप स्थित सामुदायिक भवन में अस्थायी आश्रय दिया गया है। हालांकि, सवाल यह है कि यह अस्थायी व्यवस्था आखिर कब तक परिवार का सहारा बनेगी।
जानकारी के अनुसार, सुरोधानी देवी के परिवार को अब तक किसी भी सरकारी आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका है। आर्थिक रूप से बेहद कमजोर होने के बावजूद परिवार के पास पक्का मकान नहीं है। ऐसे में सरकारी योजनाओं की जमीनी पहुंच और जरूरतमंद परिवारों तक उनके लाभ पहुंचने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
सुरोधानी देवी के पति का पहले ही निधन हो चुका है। परिवार में उनका एकमात्र सौतेला पुत्र रवि कुमार मुर्मू है, जो रोजगार की तलाश में रांची में रहकर मजदूरी करता है। मजदूरी से होने वाली सीमित आमदनी से परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पाता है। ऐसे में अपने स्तर पर नया मकान बनाना परिवार के लिए लगभग असंभव है।
बरसात के मौसम में कच्चे मकान का गिरना केवल एक घर के ढहने की घटना नहीं है, बल्कि यह गरीबी और बेबसी के साथ सरकारी योजनाओं की जमीनी स्थिति को भी सामने लाता है। जिस परिवार को पक्के आवास की सबसे अधिक जरूरत है, उसके वर्षों से आवास योजना के लाभ से वंचित रहने को लेकर अब जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल उठना स्वाभाविक है।
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मामले का तत्काल संज्ञान लेने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति की जांच कर उसे आवास योजना के तहत पक्का मकान उपलब्ध कराने की दिशा में पहल होनी चाहिए। साथ ही, स्थायी आवास मिलने तक परिवार के लिए सुरक्षित अस्थायी ठिकाने, भोजन और अन्य जरूरी सहायता की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।
अब सवाल यह है कि सामुदायिक भवन की छत सुरोधानी देवी के परिवार के लिए कितने दिनों तक सहारा बनी रहेगी और उन्हें अपना स्थायी आशियाना कब मिलेगा। क्या बरसात खत्म होने से पहले सरकारी तंत्र इस परिवार की सुध लेगा, या फिर यह परिवार सरकारी मदद के इंतजार में यूं ही दिन गुजारता रहेगा?




