विलियम जैकब
गिरिडीह : इंद्रपुरी कॉलोनी, अरगाघाट निवासी स्वर्गीय सुनीता प्रसाद की प्रथम पुण्यतिथि पर उनके पुत्र विवेक कुमार और पुत्रवधू रेखा वर्मा की ओर से गरीब एवं जरूरतमंद लोगों के लिए भोज का आयोजन किया गया। परिवार ने पुण्यतिथि को किसी भव्य आयोजन के बजाय सेवा कार्य के रूप में मनाते हुए जरूरतमंदों को भोजन कराया।
कार्यक्रम के दौरान दिवंगत सुनीता प्रसाद की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। परिजनों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी और उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया। भोज में बड़ी संख्या में गरीब और जरूरतमंद लोग शामिल हुए। परिवार के सदस्यों ने सभी का सम्मानपूर्वक स्वागत करते हुए उन्हें भोजन कराया।
सामाजिक सेवा से जुड़ी थीं सुनीता प्रसाद
परिजनों के अनुसार, सुनीता प्रसाद अपने जीवनकाल में सामाजिक कार्यों से गहराई से जुड़ी रही थीं। उन्होंने बाल कल्याण समिति और किशोर न्याय बोर्ड के साथ काम करते हुए बच्चों और समाज के जरूरतमंद वर्गों से जुड़े विषयों पर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।
सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के कारण उनसे जुड़े लोग आज भी उन्हें सम्मान और आत्मीयता के साथ याद करते हैं। बताया गया कि उनका निधन 61 वर्ष की आयु में हुआ था। उनके निधन के बाद भी परिवार उनके सामाजिक कार्यों और सेवा भाव को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
परिवार की ओर से बताया गया कि प्रथम पुण्यतिथि पर जरूरतमंदों को भोजन कराने का उद्देश्य सुनीता प्रसाद के सेवा भाव को आगे बढ़ाना है। परिवार का मानना है कि समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्ग की मदद करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मां की याद में भावुक हुए विवेक कुमार
पुत्र विवेक कुमार ने कहा कि मां की कमी को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। उन्होंने जीवनभर समाज और जरूरतमंद लोगों की सेवा को महत्व दिया। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर गरीबों को भोजन कराकर परिवार उनकी स्मृति को जीवंत रखने और उनके सेवा भाव को आगे बढ़ाने का छोटा सा प्रयास कर रहा है।
परिवार के सदस्यों ने कहा कि सुनीता प्रसाद ने जिस तरह सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया और बच्चों व जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई, वही उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान रही। उनकी स्मृतियां परिवार के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी।
पुण्यतिथि पर आयोजित सेवा कार्य के माध्यम से परिवार ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि प्रियजन की स्मृति को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित रखने के बजाय उसे समाजसेवा से जोड़ना भी सच्चे सम्मान का माध्यम हो सकता है।




