अमेठी: तिलोई विधानसभा क्षेत्र में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी चर्चाएं अभी से तेज होने लगी हैं। संभावित सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच कांग्रेस जिलाध्यक्ष और 2022 के पार्टी प्रत्याशी रहे प्रदीप सिंघल को लेकर स्थानीय स्तर पर दावेदारी की चर्चा जोर पकड़ रही है। समर्थक उन्हें PDA के मजबूत चेहरों में गिनाते हुए गठबंधन की स्थिति में भाजपा को कड़ी चुनौती देने की संभावना जता रहे हैं।
तिलोई का चुनावी इतिहास भी कांग्रेस की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं करता। वर्ष 1967 से 1991 के बीच कांग्रेस ने इस सीट पर कई बार जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के डॉ. मोहम्मद मुस्लिम ने सपा के मायांकेश्वर शरण सिंह को 2,710 वोटों के अंतर से हराया था।
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप सिंघल को 21,978 वोट मिले थे, जबकि सपा के खाते में 71,643 वोट आए। ऐसे में स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि दोनों दल गठबंधन के तहत चुनाव मैदान में उतरते हैं तो उनके समर्थक वोटों का संभावित एकीकरण मुकाबले को नया रूप दे सकता है।
जमीनी सक्रियता को बताया जा रहा ताकत
प्रदीप सिंघल की दावेदारी के समर्थक उनकी जमीनी सक्रियता को प्रमुख आधार मानते हैं। तिलोई क्षेत्र के खारे पानी से प्रभावित गांवों में पानी के टैंकर उपलब्ध कराने से लेकर जरूरतमंद परिवारों के शादी-विवाह में आर्थिक सहयोग तक उनकी सामाजिक गतिविधियों का उल्लेख किया जा रहा है।
समर्थकों के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की हार के बाद कांग्रेस के लिए कठिन राजनीतिक दौर में संगठन को सक्रिय बनाए रखना और कोविड काल में लोगों के बीच मास्क, सैनिटाइजर तथा राहत सामग्री लेकर पहुंचना भी सिंघल की राजनीतिक सक्रियता का हिस्सा रहा है।
इसी आधार पर स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि यदि सपा-कांग्रेस गठबंधन में प्रदीप सिंघल को तिलोई से उम्मीदवार बनाया जाता है तो चुनावी मुकाबले के समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि, फिलहाल गठबंधन और प्रत्याशी चयन को लेकर कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है।
भाजपा के गढ़ में चुनौती की चर्चा
तिलोई की राजनीति को करीब से देखने वाले कुछ स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि क्षेत्र में बदलाव की मांग और विपक्षी दलों की एकजुटता चुनावी तस्वीर पर असर डाल सकती है। सिंघल के समर्थक दावा करते हैं कि उनका विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संपर्क उन्हें गठबंधन की स्थिति में मजबूत उम्मीदवार बना सकता है।
हालांकि 2027 के चुनाव में अभी समय है और टिकट वितरण, गठबंधन की अंतिम स्थिति तथा राजनीतिक समीकरणों में आगे बदलाव संभव है। ऐसे में फिलहाल प्रदीप सिंघल की दावेदारी को लेकर चल रही चर्चाओं को आगामी चुनाव की शुरुआती सियासी हलचल के तौर पर देखा जा रहा है।




