कुरमाली साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले साहित्य साधक : खगेश्वर महतो

पश्चिमी सिंहभूम समाज में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही मिलते हैं, जो अपने पेशेवर जीवन से आगे बढ़कर भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण को अपना जीवन-ध्येय बना लेते हैं. पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर क्षेत्र के सेवानिवृत्त शिक्षक खगेश्वर महतो ऐसे ही साहित्य साधकों में

पश्चिमी सिंहभूम

समाज में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही मिलते हैं, जो अपने पेशेवर जीवन से आगे बढ़कर भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण को अपना जीवन-ध्येय बना लेते हैं. पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर क्षेत्र के सेवानिवृत्त शिक्षक खगेश्वर महतो ऐसे ही साहित्य साधकों में शामिल हैं, जिन्होंने कुरमाली भाषा और साहित्य को गांव की चौपाल से लेकर शैक्षणिक जगत तक पहुंचाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है.

उत्क्रमित मध्य विद्यालय, नलिता से नवंबर 2021 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपना पूरा समय कुरमाली साहित्य के विकास और प्रचार-प्रसार को समर्पित कर दिया. हालांकि उनकी साहित्यिक यात्रा सेवानिवृत्ति के बाद नहीं, बल्कि शिक्षक जीवन के दौरान ही प्रारंभ हो चुकी थी.

2016 में लिखी गई व्याकरण पुस्तक बनी मील का पत्थर

खगेश्वर महतो ने वर्ष 2016 में “कुरमाली भा अर सार” नामक व्याकरण पुस्तक की रचना की. यह पुस्तक हिंदी और कुरमाली दोनों भाषाओं में तैयार की गई थी, जिससे विभिन्न भाषाई पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए इसे समझना आसान हो गया. सरल भाषा, व्यवस्थित व्याकरण और प्रतियोगी परीक्षाओं की उपयोगिता के कारण यह पुस्तक तेजी से लोकप्रिय हुई.

जब झारखंड में शिक्षक पात्रता परीक्षा में क्षेत्रीय भाषा को अनिवार्य किया गया, तब इस पुस्तक की मांग पूरे राज्य में बढ़ गई. देखते ही देखते यह पुस्तक झारखंड के विभिन्न जिलों में विद्यार्थियों, शिक्षकों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों के बीच पहुंच गई. खास बात यह रही कि केवल कुरमाली भाषी छात्र ही नहीं, बल्कि अन्य भाषा और धर्म के विद्यार्थी भी इसे पढ़ने लगे.

लोकप्रियता से मिली नई ऊर्जा

अपनी पहली पुस्तक की अप्रत्याशित सफलता ने खगेश्वर महतो को नई ऊर्जा प्रदान की. उन्होंने महसूस किया कि कुरमाली भाषा के लिए व्यवस्थित अध्ययन सामग्री की भारी आवश्यकता है. इसके बाद उन्होंने लगातार लेखन जारी रखा और कुरमाली साहित्य को समृद्ध करने का अभियान शुरू कर दिया.

आज भी उनकी पहली पुस्तक “कुरमाली भा अर सार” शिक्षक पात्रता परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय है. वे स्वयं भी प्रतियोगी छात्रों को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं.

अब तक लिख चुके हैं 12 महत्वपूर्ण पुस्तकें

खगेश्वर महतो अब तक कुरमाली भाषा और साहित्य पर कुल 12 पुस्तकें लिख चुके हैं. इनमें व्याकरण, लोक साहित्य, प्रश्नोत्तरी, वस्तुनिष्ठ संग्रह, नाटक और भाषा शिक्षण से जुड़ी पुस्तकें शामिल हैं.

उनकी प्रमुख कृतियां हैं

कुरमाली भा अर सार

कुरमाली गाइड (वर्ग 9 एवं 10 के लिए)

कुरमाली इंटर प्रश्नोत्तरी

कुरमाली लोकगीत सार संग्रह

कुरमाली लोक कथा सार संग्रह

कुरमाली वस्तुनिष्ठ सार संग्रह

कुरमाली ऑब्जेक्टिव एमसीक्यू

केरिआ बहू नाटक वस्तुनिष्ठ

केरिआ बहू नाटक (हिंदी रूपांतरण)

केहनि जुड़ति उसास पथी

कुरमाली चुमुक चिनहाप

कुरमाली ऑब्जेक्टिव बैंक

इन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने कुरमाली भाषा के विद्यार्थियों के लिए प्राथमिक स्तर से लेकर इंटरमीडिएट तथा प्रतियोगी परीक्षाओं तक की उपयोगी अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई है.

लोक संस्कृति के संरक्षण में भी योगदान

खगेश्वर महतो का योगदान केवल पाठ्य पुस्तकों तक सीमित नहीं है. उन्होंने कुरमाली लोकगीतों और लोककथाओं का संग्रह कर उन्हें पुस्तक रूप दिया है. यह कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि आधुनिकता के दौर में पारंपरिक लोक साहित्य तेजी से विलुप्त होता जा रहा है. उनके प्रयासों से नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिल रहा है.

2019 में मिला सर्वश्रेष्ठ शिक्षक सम्मान

कुरमाली भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए झारखंड सरकार ने वर्ष 2019 में उन्हें “सर्वश्रेष्ठ शिक्षक” सम्मान से सम्मानित किया. यह सम्मान न केवल उनके शिक्षकीय जीवन की उपलब्धि है, बल्कि क्षेत्रीय भाषा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की भी सरकारी मान्यता है.

आज भी सक्रिय हैं साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में

सेवानिवृत्ति के बाद जहां अधिकांश लोग विश्राम का जीवन चुनते हैं, वहीं खगेश्वर महतो आज भी पूरी सक्रियता के साथ कार्य कर रहे हैं. वर्तमान में वे चक्रधरपुर और मनोहरपुर के विभिन्न कोचिंग संस्थानों में विद्यार्थियों को कुरमाली साहित्य की शिक्षा दे रहे हैं. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र उनके मार्गदर्शन से लाभान्वित हो रहे हैं.

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