रतन अग्रवाल
सिंदरी : हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी और हरतालिका तीज का विशेष धार्मिक महत्व है। गणेश चतुर्थी पर श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और जीवन के विघ्नों से मुक्ति की कामना करते हैं। वहीं, हरतालिका तीज पर सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, वैवाहिक जीवन की खुशहाली और समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं भी मनचाहे और योग्य वर की प्राप्ति की कामना से इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करती हैं।
हरतालिका तीज का पावन व्रत भारतीय नारी की अटूट श्रद्धा, संकल्प-शक्ति और पातिव्रत्य धर्म का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्हीं की तपस्या और समर्पण की स्मृति में यह व्रत आज भी पूरी आस्था के साथ किया जाता है।
हरतालिका तीज प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इसे महिलाओं के कठिन व्रतों में शामिल किया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और रात्रि जागरण कर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं।
हालांकि यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं से जुड़ा माना जाता है, लेकिन कुंवारी कन्याएं भी योग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए इसे श्रद्धा के साथ रखती हैं। उत्तर भारत के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हरतालिका तीज को विशेष धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है।
समय के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में इस व्रत की परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है। उत्तर भारत में कई महिलाएं निर्जला रहकर पूरे विधि-विधान से व्रत करती हैं, जबकि गुजरात और महाराष्ट्र सहित कुछ क्षेत्रों में महिलाएं फलाहार करती हैं। कुछ स्थानों पर भोजन ग्रहण करने की परंपरा भी है। हालांकि, पूजा-पद्धति में अंतर होने के बावजूद श्रद्धा और आस्था का भाव समान बना रहता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ‘हरतालिका’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—’हरत’ और ‘आलिका’। ‘हरत’ का अर्थ हरण करना और ‘आलिका’ का अर्थ सखी माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती की सखियां उन्हें उनके पिता हिमालयराज के घर से दूर वन में ले गई थीं, ताकि वे भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर सकें। इसी प्रसंग से इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा।
हरतालिका तीज का महत्व केवल उपवास और पूजा तक सीमित नहीं माना जाता। यह महिलाओं की दृढ़ इच्छाशक्ति, समर्पण और संकल्प का भी प्रतीक है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अन्न-जल त्यागकर कठोर तपस्या की थी। उनकी यही तपस्या आज भी महिलाओं के लिए श्रद्धा, धैर्य और संकल्प की प्रेरणा मानी जाती है।




