2027 से पहले भाजपा के सामने ‘सेनापति’ खोजने की कठिन परीक्षा
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के जन्मदिन पर प्रजापति ने दिखाई ताकत
सुधीर रंजन
लखनऊ। प्रदेश की हॉट सीटों में गिनी जाने वाली अमेठी विधानसभा की राजनीति में प्रजापति परिवार पिछले दो दशकों से निर्णायक भूमिका में रहा है। पूर्व मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति की शुरुआती राजनीति से लेकर अब तक के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि इस सीट पर कभी कांग्रेस, कभी भाजपा और वर्तमान में समाजवादी पार्टी का दबदबा रहा है, लेकिन 2012 के बाद से प्रजापति परिवार फ्रंटफुट पर दिखाई देता है। समाजवादी पुरोधा मुलायम सिंह यादव के मार्गदर्शन में गायत्री प्रसाद प्रजापति ने अमेठी में ऐसा मजबूत सामाजिक आधार खड़ा किया कि उनके जेल जाने के बाद भी 2022 के विधानसभा चुनाव में परिवार की राजनीतिक पकड़ बरकरार रही।
राजनीतिक हलकों में यह भी तय माना जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में भी प्रजापति या उनके परिवार का ही कोई सदस्य सपा प्रत्याशी हो सकता है। 2012 में गायत्री प्रसाद प्रजापति के सियासी उभार के बाद से भाजपा के लिए अमेठी में सबसे बड़ी चुनौती दलित-पिछड़ा-मुस्लिम वोट का गणित बन गया है। इन वर्गों में प्रजापति के गहरे प्रभाव के चलते भाजपा की रणनीति लगातार उलझती नजर आई है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इसी सामाजिक समीकरण की काट तलाशने के लिए भाजपा ऐसे स्थानीय चेहरे की खोज में जुटी है जो प्रजापति के प्रभाव वाले वोट बैंक में सेंधमारी कर सके।
वहीं बीते महीने सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के जन्मदिन पर विधायक महराजी प्रजापति के जनसंपर्क कार्यालय पर उमड़ी दस हजार महिलाओं की भीड़ से वर्तमान सियासी तापमान का अंदाजा स्वत: हो जाता है। वहीं पूर्व मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के जन्मदिन पर चारों ब्लाकों में ब्राह्मण समाज और क्षत्रिय समाज के समर्थकों द्वारा जिस तरीके से उत्साहपूर्ण आयोजन हुए, उससे साफ हो गया कि उनकी पहुंच सामान्य मतदाताओं में भी किसी से कम नहीं है। यही वो तथ्य हैं जिससे विरोधी खेमे की नींद उड़ी है।
जिले के सबसे बड़े अति पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में स्थापित गायत्री प्रसाद प्रजापति ने 2012 में जीत से पहले कई चुनावों में हार का स्वाद भी चखा, लेकिन इसके बावजूद उनका सामाजिक आधार कमजोर नहीं पड़ा। 2017 का विधानसभा चुनाव अमेठी की राजनीति में एक अपवाद के रूप में देखा जाता है, जब असामान्य परिस्थितियों और प्रदेशव्यापी लहर के बीच भाजपा प्रत्याशी रानी गरिमा सिंह को जीत मिली। इसके बाद 2022 में समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर सीट पर कब्जा कर लिया, जिससे यह साफ हो गया कि अमेठी में भाजपा की जीत स्थायी नहीं बल्कि परिस्थितिजन्य थी। यही कारण है कि भाजपा नेतृत्व अब इस सीट को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है और भविष्य की रणनीति नए सिरे से गढ़ने में जुटा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनावों में भी अमेठी का मुकाबला सामाजिक समीकरणों पर ही टिकेगा। भाजपा यदि यहां मजबूत पकड़ बनाना चाहती है तो उसे स्थानीय स्तर पर एक प्रभावी ‘सेनापति’ खड़ा करना होगा। पिछले चुनाव में भाजपा टिकट पर उतरे पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजय सिंह रिकॉर्ड मत हासिल करने के बावजूद प्रजापति के सामाजिक समीकरण को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए। ऐसे में उनके विकल्प की तलाश भाजपा के लिए आसान नहीं मानी जा रही है। उधर, दर्जन भर दावेदारों की मौजूदगी के बीच पार्टी बेहतर चेहरे की खोज में है, जबकि प्रजापति परिवार इन जोड़-घटाव से दूर अपने समर्थकों के साथ क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रहा है।




