बीबीएमकेयू में आदिवासी दिवस की धूम, लोकगीत-नृत्य ने बांधा समां

बीबीएमकेयू में आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर संथाली गीत-नृत्य, पारंपरिक स्वागत और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, पांच महुआ के पौधे भी लगाए गए।

मनीष सिन्हा

धनबाद : विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय (बीबीएमकेयू), धनबाद में एससी-एसटी सेल और राष्ट्रीय सेवा योजना के संयुक्त तत्वावधान में आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में झारखंड की आदिवासी संस्कृति, परंपरा, लोकगीत और लोकनृत्य की आकर्षक झलक देखने को मिली।

कार्यक्रम में शामिल अतिथियों का स्वागत आदिवासी परंपरा और रीति-रिवाजों के अनुरूप किया गया। लोटा-पानी, आम और सखुआ के पात, धान तथा अरवा चावल के माध्यम से पारंपरिक तरीके से अतिथियों का अभिनंदन किया गया। इसके बाद मांदर की थाप पर संथाली लोकगीत और लोकनृत्य की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति वरीय प्रोफेसर (डॉ.) रामकुमार सिंह रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में कुलसचिव प्रोफेसर राधानाथ त्रिपाठी, सीसीडीसी डॉ. आरके तिवारी, परीक्षा नियंत्रक डॉ. धनंजय कुमार सिंह, संकायाध्यक्ष डॉ. अमिता वर्मा सहित विभिन्न विभागों के अध्यक्ष और शिक्षक मौजूद रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत बिनोद बाबू और भगवान बिरसा मुंडा की तस्वीर पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्वलित कर की गई। विषय प्रवेश और स्वागत संबोधन एससी-एसटी सेल की अध्यक्ष डॉ. गौरी मुंडा ने किया। अतिथियों को अंगवस्त्र, पौधा और स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

संथाली भाषा और लोक संस्कृति रही आकर्षण का केंद्र

कार्यक्रम की खास बात यह रही कि मंच संचालन से लेकर विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में संथाली भाषा और झारखंड की लोक संस्कृति को प्रमुखता दी गई। संथाली लोकगीत और नृत्य के साथ कलाकारों ने आदिवासी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।

मुख्य अतिथि कुलपति वरीय प्रोफेसर (डॉ.) रामकुमार सिंह ने आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि प्रकृति आदिवासियों के लिए केवल संसाधन नहीं है, बल्कि उनकी संस्कृति, आस्था और जीवन का आधार है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं है। झारखंड जैसे आदिवासी राज्य में आदिवासी समाज के ज्ञान, इतिहास, भाषा और संस्कृति के विकास एवं संवर्धन की जिम्मेदारी भी विश्वविद्यालय की है।

कुलसचिव प्रोफेसर राधानाथ त्रिपाठी ने कहा कि अगले वर्ष से आदिवासी कला और संस्कृति के साथ इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं को भी कार्यक्रम के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया जाएगा।

कार्यक्रम में डॉ. मृत्युंजय कुमार सिंह, उमेश कुमार, संजू कुमारी, रीता सिंह, रीता शर्मा, शीतल टोप्पो, ताप्ती चक्रवर्ती, सीमा कुमारी, अनुराधा लकड़ा, तनुजा, सरिता, किरीम मुर्मू, नीलू कुमारी, नमिता, सुनंदा समेत विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, शिक्षक और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. शीतल और एनएसएस कोऑर्डिनेटर डॉ. मुकुंद रविदास का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम के समापन पर विश्वविद्यालय परिसर में पांच महुआ के पौधे लगाए गए। इस पहल के जरिए प्रकृति संरक्षण और आदिवासी जीवन में पेड़-पौधों के महत्व का संदेश दिया गया।

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